चाणक्य

चाणक्य सूत्र

  1. देखने में शत्रु जैसा बर्ताव करने वाला भी यदि हितकारी हो तो वह बंधु है, बंधु समझकर अपनाया हुआ व्यक्ति भी यदि अहितकारी हो तो वह शत्रु है।  व्याधि स्वदेहज होने पर भी अपना शत्रु होती है तथा औषध सुदूर अरण्य या पर्वत पर उत्पन्न होने पर भी हितकारी मानी गयी है।
  2. पात्रापात्र विचार न करके अपात्र को क्षमा करना तथा पात्र को क्षमा से वंचित रखना विचारशून्यता है।  क्षमा राजधर्म है।  दंडधारी ही निरपराधों को अदंडित रखने तथा अपराधियों को दण्डित करने का अधिकार रखते हैं।  राजा न्यायनिष्ठ प्रजा की ओर से ही न्यायाधीश के आसन पर नियुक्त होता है।
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