Monthly Archives: April 2014

चूहा और जादूगर

एक चूहा था।  उसे बिल्ली से बड़ा डर लगता था।  हालांकि यह स्वाभाविक है कि चूहे को बिल्ली से डर लगे, पर इस चूहे को कुछ ज्यादा ही डर लगता था। अपने सुरक्षित बिल में सोते हुए भी सपने में उसे बिल्ली नजर आती। हल्की-सी आहट से उसे बिल्ली के आने का अंदेशा होने लगता। सीधी-सी बात यह कि बिल्ली से भयभीत चूहा चौबीसों घंटे घुट-घुटकर जीता था।  ऐसे में एक दिन एक बड़े जादूगर से उसकी मुलाक़ात हो गई। फिर तो चूहे के भाग ही खुल गए। जादूगर को उस पर दया आ गई, तो उसने उसे चूहे से बिल्ली बना दिया।  बिल्ली बना चूहा उस समय तो बड़ा ख़ुश हुआ, पर कुछ दिनों बाद फिर जादूगर के पास पहुंच गया, यह शिकायत लेकर कि कुत्ता उसे बहुत परेशान करता है।  जादूगर ने उसे कुत्ता बना दिया। कुछ दिन तो ठीक रहा, फिर कुत्ते के रूप में भी उसे परेशानी शुरू हो गई। अब उसे शेर-चीतों का बड़ा डर रहता। इस दफ़ा जादूगर ने सोचा कि पूरा इलाज कर दिया जाए, सो उसने कुत्ते का रूप पा चुके चूहे को शेर ही बना दिया।  जादूगर ने सोचा कि शेर जंगल का राजा है, सबसे शक्तिशाली प्राणी है, इसलिए उसे किसी से डर नहीं लगेगा।  लेकिन नहीं। शेर बनकर भी चूहा कांपता ही रहा। अब उसे किसी और जंगली जीव से डरने की जरूरत नहीं थी, पर बेचारे को शिकारियों से बड़ा डर लगता।  आख़िर वह एक बार फिर जादूगर के पास पहुंच गया। लेकिन इस बार जादूगर ने उसे शिकारी नहीं बनाया। उसने उसे चूहा ही बना दिया। जादूगर ने कहा-‘चूंकि तेरा दिल ही चूहे का है, इसलिए तू हमेशा डरेगा ही।’ 

सबक : डर कहीं बाहर नहीं होता, वह हमारे भीतर ही होता है। स्वार्थ की अधिकता और आत्म-विश्वास की कमी से हम डरते हैं।  इसलिए अपने डर को जीतना है, तो पहले ख़ुद
को जीतना पड़ेगा।

 

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भाग्य/दुर्भाग्य

एक बुजुर्ग ग्रामीण के पास एक बहुत ही सुंदर और शक्तिशाली घोड़ा था.
वह उससे बहुत प्यार करता था. उस घोड़े को खरीदने के कई आकर्षक प्रस्ताव उसके पास आए, मगर उसने उसे नहीं बेचा.
एक रात उसका घोड़ा अस्तबल से गायब हो गया.
गांव वालों में से किसी ने कहा
“अच्छा होता कि तुम इसे किसी को बेच देते. कई तो बड़ी कीमत दे रहे थे. बड़ा नुकसान हो गया.”
परंतु उस बुजुर्ग ने यह बात ठहाके में उड़ा दी और कहा – “आप सब बकवास कर रहे हैं. मेरे लिए तो मेरा घोड़ा बस अस्तबल में नहीं है. ईश्वर इच्छा में जो होगा आगे देखा जाएगा.”
कुछ दिन बाद उसका घोड़ा अस्तबल में वापस आ गया. वो अपने साथ कई जंगली घोड़े व घोड़ियाँ ले आया था.
ग्रामीणों ने उसे बधाईयाँ दी और कहा कि उसका तो भाग्य चमक गया है.
परंतु उस बुजुर्ग ने फिर से यह बात ठहाके में उड़ा दी और कहा – “बकवास! मेरे लिए तो बस आज मेरा घोड़ा वापस आया है. कल क्या होगा किसने देखा है.”
अगले दिन उस बुजुर्ग का बेटा एक जंगली घोड़े की सवारी करते गिर पड़ा और उसकी टाँग टूट गई. लोगों ने बुजुर्ग से सहानुभूति दर्शाई और कहा कि इससे तो बेहतर होता कि घोड़ा वापस ही नहीं आता. न वो वापस आता और न ही ये दुर्घटना घटती.
बुजुर्ग ने कहा – “किसी को इसका निष्कर्ष निकालने की जरूरत नहीं है. मेरे पुत्र के साथ एक हादसा हुआ है, ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है, बस”
कुछ दिनों के बाद राजा के सिपाही गांव आए, और गांव के तमाम जवान आदमियों को अपने साथ लेकर चले गए. राजा को पड़ोसी देश में युद्ध करना था, और इसलिए नए सिपाहियों की भरती जरूरी थी. उस बुजुर्ग का बेटा चूंकि घायल था और युद्ध में किसी काम का नहीं था, अतः उसे नहीं ले जाया गया.
गांव के बचे बुजुर्गों ने उस बुजुर्ग से कहा – “हमने तो हमारे पुत्रों को खो दिया. दुश्मन तो ताकतवर है. युद्ध में हार निश्चित है. तुम भाग्यशाली हो, कम से कम तुम्हारा पुत्र तुम्हारे साथ तो है.”
उस बुजुर्ग ने कहा – “अभिशाप या आशीर्वाद के बीच बस आपकी निगाह का फ़र्क होता है. इसीलिए किसी भी चीज को वैसी निगाहों से न देखें. निस्पृह भाव से यदि चीजों को होने देंगे तो दुनिया खूबसूरत लगेगी…

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श्री गुरु नानक देव जी जगत का उद्धार करते हुए एक गाँव के बाहर पहुँचे और देखा वहाँ एक झोपड़ी बनी हुई थी। उस झोपड़े में एक आदमी रहता था, जिसे कुष्‍ठ का रोग था। गाँव के सारे लोग उससे नफरत करते थे कोई उसके पास नहीं आता था। कभी किसी को दया आ
जाती तो उसे खाने के लिए कुछ दे देते।

गुरुजी उस कोढ़ी के पास गए और कहा- भाई हम आज रात तेरी झोपड़ी में रहना चाहते है अगर तुझे कोई परेशानी ना हो तो। कोढ़ी हैरान हो गया क्योंकि उसके तो पास में कोई आना नहीं चाहता था। फिर उसके घर में रहने के लिए कोई राजी कैसे हो गया?

कोढ़ी अपने रोग से इतना दुखी था कि चाह कर भी कुछ ना बोल सका। सिर्फ गुरुजी को देखता ही रहा। लगातार देखते-देखते ही उसके शरीर में कुछ बदलाव आने लगे, पर कह नहीं पा रहा था। गुरुजी ने मरदाना को कहा- रबाब बजाओ और गुरुजी उस झोपड़ी में बैठ कर कीर्तन करने लगे। कोढ़ी ध्यान से कीर्तन सुनता रहा। कीर्तन समाप्त होने पर कोढ़ी के हाथ जुड़ गए जो ठीक से हिलते भी नहीं थे। उसने गुरुजी के चरणों में अपना माथा टेका।

गुरुजी ने कहा-‘और भाई ठीक हो, यहाँ गाँव के बाहर झोपड़ी क्यों बनाई है?’कोड़ी ने कहा-‘मैं बहुत बदकिस्मत हूँ, मुझे कुष्ठ रोग हो गया है, मुझसे कोई बात नहीं करता यहाँ तक कि मेरे घर वालो ने भी मुझे घर से निकाल दिया है। मैं नीच हूँ इसलिए कोई मेरे पास नहीं आता।’

उसकी बात सुन कर गुरुजी ने कहा-‘नीच तो वो लोग है जिन्होंने तुम जैसे रोगी पर दया नहीं की और अकेला छोड़ दिया।’आ मेरे पास मैं भी तो देखूँ… कहाँ है तुझे कोढ़? जैसे ही गुरुजी ने ये वचन कहे कोढ़ी गुरुजी के नजदीक आया तो प्रभु की ऐसी कृपा हुई कि कोढ़ी बिलकुल ठीक हो गया।

यह देख वह गुरुजी के चरणों में गिर गया। गुरुजी ने उसे उठाया और गले से लगा के कहा-‘प्रभु का स्मरण करो और लोगों की सेवा करो यही मनुष्य के जीवन का मुख्य कार्य है।’

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भारतीय गाइड

एक बार की बात है भारत में एक भारतीय गाइड़
किसी विदेशी पर्यटक को दिल्ली घुमा रहा था।
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भारतीय गाइड ने कहा:- “यह हमारा संसद भवन है।”
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विदेशी पर्यटक ने कहा:- बस….? इतना बड़ा तो हमारे
यहाँ पिज्जा होता है।”
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भारतीय गाइड चुप रहा और उसे आगे ले गया।
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फिर बोला :-“यह है हमारा लाल किला।
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विदेशी पर्यटक बोला:- बस….? इतना तो हमारे यहां बर्गर
होता है।”
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भारतीय गाइड को गुस्सा तो बहुत आ रहा था मगर वह चुप रहा।
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भारतीय गाइड उसे आगे कुतुब मीनार दिखाने पहुँचा।
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विदेशी पर्यटक ने पूछा, :-“ये क्या है?”
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भारतीय गाइड बोला, :-“ये तुम्हारे पिज्जा ऒर बर्गर पर
टोमेटो सास डालने की बोतल है।

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एक कप कॉफी

दोस्तों का एक पुराना ग्रुप कॉलेज छोड़ने के बहुत दिनों बाद मिला। वे सभीअपने-अपने करियर में बहुत अच्छा कर रहे थे और खूब पैसे कमा रहे थे। जब आपसमें मिलते -जुलते काफी वक़्त बीत गया तो उन्होंने अपने सबसे फेवरेट प्रोफेसरके घर जाकर मिलने का निश्चय किया।

प्रोफेसर साहब ने उन सभी कास्वागत किया और बारी-बारी से उनके काम के बारे में पूछने लगे। धीरे-धीरेबात लाइफ में बढ़ती स्ट्रेस और काम के प्रेशर पर आ गयी। इस मुद्दे पर सभी एकमत थे कि भले वे अब आर्थिक रूप से बहुत मजबूत हों पर उनकी लाइफमें अब वो मजा नहीं रह गया जो पहले हुआ करता था।

प्रोफेसर साहब बड़े ध्यान से उनकी बातें सुन रहे थे , वे अचानक ही उठे औरथोड़ी देर बाद किचन से लौटे सुर बोले , ” डीयर स्टूडेंट्स , मैं आपके लिएगरमा-गरम कॉफ़ी लेकर आया हूँ , लेकिन प्लीज आप सब किचन में जाकर अपने-अपनेलिए कप्स लेते आइये। ” ,

लड़के तेजी से अंदर गए, वहाँ कई तरह के कपरखे हुए थे , सभी अपने लिए अच्छा से अच्छा कप उठाने में लग गये , किसी नेक्रिस्टल का शानदार कप उठाया तो किसी ने पोर्सिलेन का कप सेलेक्ट किया, तोकिसी ने शीशे का कप उठाया।

जब सभी के हाथों में कॉफी आ गयी तोप्रोफ़ेसर साहब बोले , ” अगर आपने ध्यान दिया हो तो , जो कप दिखने में अच्छेऔर महंगे थे आपने उन्हें ही चुना और साधारण दिखने वाले कप्स की तरफ ध्याननहीं दिया। जहाँ एक तरफ अपने लिए सबसे अच्छे की चाह रखना एक नॉर्मल बात हैवहीँ दूसरी तरफ ये हमारी लाइफ में प्रोब्लम्स और स्ट्रेस लेकर आता है।

फ्रेंड्स, ये तो पक्काहै कि कप कॉफी की क्वालिटी में कोई बदलाव नहींलाता। ये तो बस एक जरिया है जिसके माध्यम से आप कॉफी पीते हैं… असल में जोआपको चाहिए था वो बस कॉफ़ी थी, कप नहीं , पर फिर भी आप सब सबसे अच्छे कप केपीछे ही गए और अपना लेने के बाद दूसरों के कप निहारने लगे।येलाइफ कॉफ़ी की तरह है ; हमारी नौकरी , पैसा , पोजीशन , कप की तरह हैं। ये बसलाइफ जीने के साधन हैं खुद लाइफ नहीं ! और हमारे पास कौन सा कप है ये नहमारी लाइफ को डिफाइन करता है और ना ही उसे चेंज करता है। कॉफी की चिंताकरिये कप की नहीं। दुनिए के सबसे खुशहाल लोग वो नहीं होते जिनके पास सबकुछसबसे बढ़िए होता है , वे तो जो होता है बस उसका सबसे अच्छे से यूज़ करते हैं।सादगी से जियो। सबसे प्रेम करो। सबकी केअर करो। यही असली जीना है।”

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एक भिखारी

सड़क किनारे एक भिखारी बैठा हुआ था. उसने सूरत से ही सम्पन्न लगने वाले एक आदमी को अपनी ओर आते देखा तो कातर स्वर में बोला – “साहब, भगवान के लिए इस गरीब को रोटी खाने के लिए दो रुपये दे दीजिए … ”

आदमी यह सुनकर ठिठका, फिर बोला – “अबे, रोटी खाकर क्या करेगा, चल मैं तुझे व्हिस्की पिलाता हूँ !”

भिखारी – “नहीं साहब, मैं शराब नहीं पीता.”

आदमी – “तो ये ले सिगार पी … बीस रुपये का आता है ये !”

भिखारी – “नहीं नहीं साहब, मैं धूम्रपान नहीं करता .”

आदमी – “अच्छा तो फिर चल, मेरे साथ कैसीनो चल… मैं पैसे लगाऊंगा और तू खेलना. हो सकता है तू ढेर सारा पैसा जीत जाए !”

भिखारी – “राम राम, जुआ खेलना तो बहुत बुरी बात होती है साहब … ”

आदमी – “अच्छा तो फिर चम्पाबाई के कोठे पर चल, तुझे मुजरा दिखाकर लाता हूँ … ”

भिखारी – “नहीं साहब, मैं वेश्याओं के यहाँ नहीं जाता !”

आदमी – “ठीक है तो फिर एक बार मेरे घर तो चल … ”

भिखारी – “आपके घर क्यों साहब ?”

आदमी – “मैं अपनी बीवी को दिखाना चाहता हूँ कि जो आदमी शराब नहीं पीता, सिगरेट नहीं पीता, जुआ नहीं खेलता और बाजारू औरतों के पीछे नहीं घूमता … वह कैसा होता है !”

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