Monthly Archives: October 2012

चाणक्य सूत्र

  1. देखने में शत्रु जैसा बर्ताव करने वाला भी यदि हितकारी हो तो वह बंधु है, बंधु समझकर अपनाया हुआ व्यक्ति भी यदि अहितकारी हो तो वह शत्रु है।  व्याधि स्वदेहज होने पर भी अपना शत्रु होती है तथा औषध सुदूर अरण्य या पर्वत पर उत्पन्न होने पर भी हितकारी मानी गयी है।
  2. पात्रापात्र विचार न करके अपात्र को क्षमा करना तथा पात्र को क्षमा से वंचित रखना विचारशून्यता है।  क्षमा राजधर्म है।  दंडधारी ही निरपराधों को अदंडित रखने तथा अपराधियों को दण्डित करने का अधिकार रखते हैं।  राजा न्यायनिष्ठ प्रजा की ओर से ही न्यायाधीश के आसन पर नियुक्त होता है।
  3. ………
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Bill Gates’ Quotes

  • As we look ahead into the next century, leaders will be those who empower others.
  • I really had a lot of dreams when I was a kid, and I think a great deal of that grew out of the fact that I had a chance to read a lot.
  • If I had some set idea of a finish line, don’t you think I would have crossed it years ago?
  • It’s fine to celebrate success but it is more important to heed the lessons of failure.
  • To create a new standard, it takes something that’s not just a little bit different; it takes something that’s really new and really captures people’s imagination — and the Macintosh, of all the machines I’ve ever seen, is the only one that meets that standard.
  • Rather than just chasing the rupee sign, managers and entrepreneurs should work hard to chase their passion. Money will come chasing on its own!
  • If you want to become a leader that people admire and respect, you must become a person of significance. People don’t follow you because you take from them; they follow you because you give to them.
  • Your most unhappy customers are your greatest source of learning.
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अधिकारमद

वर्धमान नगर में आभूषणों का व्यापारी दंतिल अपने उत्तम व्यावहार से राजपुरुषों और सामान्य प्रजाजनों में अत्यंत प्रिय था। इस सेठ ने अपनी कन्या के विवाह के अवसर पर राजपरिवार की रानियों और परिजनों को निमंत्रित किया।

राज परिवार के सदस्यों के साथ गोरम्भ नमक सफाई-कर्मचारी भी सेठ के घर जा पहुंचा।  वह अपनी स्थिति को भूलकर अथवा अपने को आमंत्रित अतिथि समझकर शिष्ट वर्ग की पंक्ति में बैठ गया।  सेठ ने यह देखा तो क्रुद्ध होकर उसने गोरम्भ का गला पकड़कर उसे वहां से उठा दिया।

सेठ द्वारा सार्वजानिक रूप से किये गये इस अपमान से गोरम्भ बहुत दुखी हुआ।  वह लहू का घूँट पीकर घर लौट आया और सेठ से प्रतिशोध लेने के लिये उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा करने लगा।  उसके ह्रदय में प्रतिशोध की ज्वाला इतनी अधिक प्रचंड थी कि उसकी रातें करवटें बदलते ही बीतती थीं।  वह सुख की नींद नहीं सो पाता था।

एक दिन महल में झाड़ू लगाते हुए गोरम्भ ने राजा को अर्ध-निद्रित अवस्था में देखा तो उसे सुनाने की इच्छा से बडबडाते हुए वह बोला – यह भी दंतिल सेठ का कितना बड़ा सौभाग्य और साहस है कि वह रानी का आलिंगन-चुम्बन करने लगा है।

राजा ने हड़बड़ाकर शय्या से उठते हुए गोरम्भ को पुकारा और उसे डांटते हुए पूछा – यह तुम क्या अंट-शंट बक रहे हो?  गोरम्भ ने अभिनय करते हुए राजा की उत्सुकता को जगाने की इच्छा से कहा – महाराज! मैंने तो कुछ नहीं कहा, आपको भ्रम लगा है।

राजा ने सोचा कि गोरम्भ का रनिवास में बेरोकटोक प्रवेश है और दंतिल सेठ को भी हमने प्रवेश की अनुमति दे रखी है।  संभव है कि इसने दंतिल को रानी का आलिंगन करते हुए देखा है और अब भय के कारण सत्य को छिपा रहा है।  वस्तुतः जीवन का सत्य ही स्वप्न अथवा प्रलाप बनकर बाहर आता है।

राजा ने सोचा,  संभव है कि रानी भी दंतिल सेठ में अनुरक्त हो।  यह सोचकर राजा एक ओर तो रानी से खिंचा रहने लगा और दूसरी ओर उसने महल में दंतिल सेठ के प्रवेश पर रोक लगा दी।

राजा के बदले तेवर देखकर दंतिल चिंतित हो उठा और सोचने लगा कि मुझसे जाने-अनजाने क्या अपराध हो गया है जिससे कि राजा मुझसे सहसा रूष्ट हो गया है।  इसी सोच-विचार में उसे गोरम्भ के प्रति किये अपने व्यव्हार का स्मरण हो आया।  उसने सोचा कि आखिर वह राजपुरुष था, मुझे उसका अपमान नहीं करना चाहिये था।  लगता है यह आग उसी की लगाई हुई है।

दंतिल ने रात पड़ते ही गोरम्भ को अपने घर पर बुलाकर अपने अपराध के लिये न केवल खेद प्रकट किया अपितु धोती, दुपट्टे आदि की भेंट से उसे सम्मानित भी किया।  गोरम्भ ने प्रसन्न होकर दंतिल को पुनः पूर्ववत राजा का कृपापात्र बनाने का आश्वाशन दिया।

दूसरे दिन गोरम्भ ने महल में झाड़ू लगाते हुए राजा को अर्ध निद्रित अवस्था में देखा तो वह बडबडाते हुए बोला – हमारे महाराज को मलत्याग करते समय ककड़ी खाने की कैसी बुरी आदत है?  राजा ने सहसा जाग कर गोरम्भ को फटकारते हुए कहा – दुष्ट! यह कैसी बकवास कर रहे हो?  तुम्हें सेवक समझकर मैं दण्डित नहीं कर रहा, परन्तु क्या तुमने कभी हमें मलत्याग करते समय कुछ खाते हुए देखा है?  गोरम्भ भयभीत होने का अभिनय करते हुआ बड़े ही भोलेपन से बोला – महाराज!  क्या मैंने कुछ कहा है जिससे की आप प्रातः बेला में मुझसे रुष्ट होकर कुछ पूछ रहे हैं?

राजा ने गोरम्भ की निर्भीक वाणी सुनकर सोचा की लगता है इसकी अंट-शंट बकने की आदत है।  मैंने तो जीवन में मलत्याग करते समय कभी ककड़ी नहीं खायी।  लगता है कि रानी से दंतिल सेठ के आलिंगन की इसकी बडबडाहट भी सर्वथा निराधार है।  मैंने उस निरपराध को अपनी कृपा से वंचित करके उसके प्रति अन्याय ही किया है।  वस्तुतः उस जैसा परीक्षित साधु पुरुष राज-परिवार की स्त्रियों पर कुदृष्टि डाल ही नहीं सकता।  यह सोचकर राजा ने दंतिल को बुला कर उसे सम्मानित किया और रनिवास में उसके प्रवेश पर लगे प्रतिबन्ध को हटा लेने की सूचना देकर उसे हर्षित बनाया।

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दान की महिमा

एक भिखारी सुबह-सुबह भीख मांगने निकला। चलते समय उसने अपनी झोली में जौ के मुट्ठी भर दाने डाल दिए, इस टोटके या अंधविश्वास के कारण कि भिक्षाटन के लिए निकलते समय भिखारी अपनी झोली खाली नहीं रखते। थैली देखकर दूसरों को भी लगता है कि इसे पहले से ही किसी ने कुछ दे रखा है।

पूर्णिमा का दिन था, भिखारी सोच रहा था कि आज अगर ईश्वर की कृपा होगी तो मेरी यह झोली शाम से पहले ही भर जाएगी। अचानक सामने से राजपथ पर उसी देश के राजा की सवारी आती हुई दिखाई दी।

भिखारी खुश हो गया। उसने सोचा कि राजा के दर्शन और उनसे मिलने वाले दान से आज तो उसके सारे दरिद्र दूर हो जाएंगे और उसका जीवन संवर जाएगा। जैसे-जैसे राजा की सवारी निकट आती गई, भिखारी की कल्पना और उत्तेजना भी बढ़ती गई।

जैसे ही राजा का रथ भिखारी के निकट आया, राजा ने अपना रथ रूकवाया और उतर कर उसके निकट पहुंचे।

भिखारी की तो मानो सांसें ही रूकने लगीं, लेकिन राजा ने उसे कुछ देने के बदले उल्टे अपनी बहुमूल्य चादर उसके सामने फैला दी और उससे भीख की याचना करने लगा। भिखारी को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करें। अभी वह सोच ही रहा था कि राजा ने पुनः याचना की। भिखारी ने अपनी झोली में हाथ डाला मगर हमेशा दूसरों से लेने वाला मन देने को राजी नहीं हो रहा था।

जैसे-तैसे करके उसने दो दाने जौ के निकाले और राजा की चादर में डाल दिए। उस दिन हालांकि भिखारी को अधिक भीख मिली, लेकिन अपनी झोली में से दो दाने जौ के देने का मलाल उसे सारा दिन रहा। शाम को जब उसने अपनी झोली पलटी तो उसके आश्चर्य का सीमा न रही।

जो जौ वह अपने साथ झोली में ले गया था, उसके दो दाने सोने के हो गए थे। अब उसे समझ में आया कि यह दान की महिमा के कारण ही हुआ। वह पछताया कि – काश! उस समय उसने राजा को और अधिक जौ दिए होते लेकिन दे नहीं सका, क्योंकि उसकी देने की आदत जो नहीं थी।

“देने से कोई चीज कभी घटती नहीं। लेने वाले से देने वाला बड़ा होता है।”

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धन की प्रतिष्ठा

दक्षिणी प्रदेश के किसी एक नगर में रहने वाले वर्धमान नामक वैश्य ने सोचा कि यद्यपि मेरे पास धन संपत्ति का कोई अभाव नहीं, फिर भी मुझे और अधिक धन जोड़ना चाहिये, क्योंकि इस संसार में धन की ही अधिक प्रतिष्ठा है।

धन कमाने के इच्छुक उस वैश्य ने सोचा कि धन कमाने के छ साधन हैं – भिक्षा, सेवावृत्ति (नौकरी), कृषि, विद्या-कला, साहूकारा (ब्याज पर ऋण देना) तथा व्यापार.  इनमें व्यापार ही सर्वोत्तम है, क्योंकि भिक्षा वृत्ति से मनुष्य का गौरव नष्ट हो जाता है।  सेवावृत्ति से जीवन-निर्वाह के लिए अपेक्षित (पर्याप्त) धन नहीं मिल पाता। कृषि कष्ट साध्य और दैव पर आश्रित होती है, विद्या-प्राप्ति  के लिए कठोर श्रम और साधना अपेक्षित है।  ब्याज पर ऋण देने से कभी-कभी ऋणकर्ता की मृत्यु अथवा दरिद्रता साहूकार तो डुबो देते हैं, परन्तु व्यापार में इस प्रकार का कोई खतरा नहीं, अतः व्यापार ही जीविका का सम्मानित, सुखद और सुरक्षित साधन है।

इस प्रकार व्यापार को अपनाने का निश्चय करने के उपरांत वर्धमान ने सोचा कि कैसा व्यापार किया जाय।  उसके सामने व्यापार के सात विकल्प आये –

  1. सुगन्धित द्रव्यों – तेल, इत्र का व्यापार
  2. स्वर्ण-रजत के आभूषणों का क्रय विक्रय
  3. खाद्य-सामग्री का क्रय-विक्रय तथा आपूर्ति
  4. परिचित ग्राहकों को धोखे में रखकर अर्थात घटिया को बढ़िया बताकर सौदा बेचना
  5. कृत्रिम अभाव पैदा करके वस्तुओं का मूल्य बाधा-चढ़ा कर लाभ कमाना
  6. कम तोलना
  7. विदेशों से वस्तुओं का आयात-निर्यात अर्थात विदेश व्यापार करना

वर्धमान ने इन सातों प्रकार के व्यापारों में विदेश व्यापार को अधिक लाभदायक मानकर मथुरा नगरी के लोगों के लिये अपेक्षित आवश्यकताओं की वस्तुओं से गाड़ी भरकर शुभ मुहूर्त में उधर की और प्रस्थान किया।

संयोगवश वर्धमान की गाड़ी को खींचने वाले दो बैलों – संजीवक और नंदक – में से एक संजीवक यमुना के कछार में पहुँचते ही दलदल में फंस कर गिर पड़ा।  वैश्य ने तीन दिन तक अपनी यात्रा स्थगित करके उस बैल के स्वस्थ होने की प्रतीक्षा की, परन्तु उसके न उठने पर अपने साथियों के परामर्श पर वह उसे वहीँ छोड़कर उधर के पास-पड़ोस के इलाके से एक दूसरा बैल खरीदकर आगे चल दिया।

Science of Divine Living

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