चाणक्य सूत्र

  1. देखने में शत्रु जैसा बर्ताव करने वाला भी यदि हितकारी हो तो वह बंधु है, बंधु समझकर अपनाया हुआ व्यक्ति भी यदि अहितकारी हो तो वह शत्रु है।  व्याधि स्वदेहज होने पर भी अपना शत्रु होती है तथा औषध सुदूर अरण्य या पर्वत पर उत्पन्न होने पर भी हितकारी मानी गयी है।
  2. पात्रापात्र विचार न करके अपात्र को क्षमा करना तथा पात्र को क्षमा से वंचित रखना विचारशून्यता है।  क्षमा राजधर्म है।  दंडधारी ही निरपराधों को अदंडित रखने तथा अपराधियों को दण्डित करने का अधिकार रखते हैं।  राजा न्यायनिष्ठ प्रजा की ओर से ही न्यायाधीश के आसन पर नियुक्त होता है।
  3. जो व्यक्ति स्वभाव से कर्तव्यहीन है, अथवा कर्त्तव्य से भागता है, वह अपने आश्रितों का भरण-पोषण नहीं कर सकता।  मनुष्य जब कर्तव्यहीन हो जाता है, तो उसके आश्रित बड़ा दुःख पाते हैं।  ऐसे मनुष्य का फिर परिवार और समाज में कोई स्थान नहीं रह जाता है।  वह उपेक्षा पाता है, और अनादर का पात्र बन जाता है।  ऐसा मनुष्य पृथ्वी पर भार समझा जाता है।
  4. जो काम मानवोचित धर्म तथा मानवोचित अर्थ नीति दोनों में से किसी को भी विकृत नहीं करता, वही स्वीकारणीय काम है।  यथार्थ, ‘काम’ वही है, जो धर्म और अर्थ दोनों में से किसी को बाधा न दे या हानि न पहुंचाए।  धर्म अर्थात दूसरों के अधिकार पर अनाक्रमण तथा अर्थ अर्थात धर्मपूर्वक उपार्जित जीवन साधनों का विरोध ‘काम’ कहे गये हैं।
  5. विवाद के समय किसी का अँधा विरोध नहीं करना चाहिए तथा अपने धर्म को भी नहीं भूलना चाहिए।  जो लोग ऐसा करते हैं वे कभी किसी से विवाद की बातें नहीं किया करते।  इसी में उसकी भलाई निहित होती है।
  6. राज सेवा में भीरु तथा अकर्मण्य लोगों का कोई उपयोग नहीं।  वे राजाज्ञा का पालन न तो कर्तव्य समझकर कर सकते हैं और न ही अपने सुझाव आदि से राजा को प्रसन्न कर सकते हैं।  ऐसे लोग न केवल अपने लिए और न दूसरों के लिए कुछ कर सकते हैं, वे तो केवल अपनी अकर्मण्यता को ही प्रशंसनीय समझते हैं।
  7. जैसे भूख मिटाने के लिए बालू को उबालना निरर्थक होता है, इसी प्रकार भ्रांत उपायों से सुखअन्वेषण भी व्यर्थ होता है। धन के बिना किसी कार्य का करना बालू से तेल निकालने के समान है। अतएव बिना पर्याप्त धन के कोई कार्य न करना चाहिए।
  8. पत्नी आदि परिवार की जीवन यात्रा में धन की आवश्यकता होती है।  परिवारकों की जीवन यात्रा के लिए गृहपतियों का धनपति होना आवश्यक है।  जैसे वृक्षवासी पक्षी फल, पुष्प, पत्र हीन सूखे वृक्षों को या जैसे जलवासी पक्षी शुष्क तालाब को त्याग देते हैं, इसी प्रकार धनहीन मानव अपने स्वजनों की श्रद्धा तथा स्नेह से वंचित हो जाते हैं।
  9. गरीब आदमी की अच्छी बातों पर भी कोई ध्यान नहीं देता है।  उसे लोग केवल मजाक में लेते हैं और उसका उपहास करते हैं।
  10. अर्थाभाव से जीवन यात्रा की चिंता से व्याकुलता बने रहने से बुद्धि धीमी पड़ जाती है तथा प्रतिभा सो जाती है।  निर्धनता की स्थिति में बुद्धि को हताश, निराश न होने दें।  बुद्धिमान व्यक्ति समाज की शक्ति होते हैं।  राज संस्था का निर्माण करना इन्हीं लोगों का काम होता है।
  11. केवल भौतिक शक्ति पर निर्भर हो जाने से काम नहीं बनता।  भौतिक शक्ति मनुष्य को अँधा बना देती है।
  12. राष्ट्र की कर्म शक्ति और राज्य कर्मचारियों द्वारा घूस न लिये जाने पर राष्ट्र की आय बढ़ जाती है।
  13. देश काल पहचान कर कार्य करने वाले के पास संपत्तियां स्वमेव आ जाती हैं।
  14. अव्यवस्थित चित्त वाले व्यक्ति के पास वृत्ति, अर्थात सद्व्यवहार कराने वाली सद्भावना नहीं रहती।
  15. धर्म का अनुष्ठान तथा राष्ट्र की कामनाओं की पूर्ति, राज्य-ऐश्वर्य की स्थिरता पर ही निर्भर रहा करती है।
  16. किसी राष्ट्र के धार्मिक लोग दरिद्र हैं तो धार्मिक लोगों की दरिद्रता राष्ट्र का अभिशाप है।  राष्ट्र की धार्मिक जनता ही वास्तव में राष्ट्र का सच्चा प्रतिनिधि है।  उसी पर राष्ट्र की शक्ति और भविष्य निर्भर करता है।
  17. दान में शूरता दिखाने वाला ही सच्चा वीर है।
  18. संपत्तियुक्त जीवन बिताना ही दीर्घायु तथा स्वास्थ्य का जनक है।  इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह धन संग्रह करे।
  19. अपनी इन्द्रियों पर अपना आधिपत्य बनाये रखना राज्य की स्थिरता का सबसे बड़ा आधार है।  ऐसे लोग जो चरित्रहीन हैं, उनके व्यवहारों के कारण राज्य-संस्था कभी सुरक्षित नहीं रह सकती है।
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